मंगलवार, 30 अगस्त 2016

पित् दोष के सरल उपाय.......निवारण.

हिंदू धर्म में श्राद्ध
की व्यवस्था इसलिए की गई है कि मनुष्य साल
में एक बार अपने पितरों को याद कर उनके प्रति अपनी
श्रद्धा व्यक्त कर सके। श्राद्ध का अर्थ अपने पितरों से प्रति
व्यक्त की गई श्रद्धा से है। जिस व्यक्ति की
कुंडली में पितृ दोष होता है, उसके लिए भी
श्राद्ध पक्ष का समय विशेष होता है क्योंकि इन 16 दिनों में किए गए
कर्मों के आधार पर ही पितृ दोष से मुक्ति मिलना संभव है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो लोग श्राद्ध पक्ष के दौरान अपने पितरों का
तर्पण, पिण्डदान व श्राद्ध नहीं करते, उन्हें कई
समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है
उनके यहां संतान होने में समस्याएं आती हैं। कई बार तो
संतान पैदा ही नहीं होती और यदि
संतान हो जाए तो उनमें से कुछ अधिक समय तक जीवित
नहीं करती
2. पितृ दोष होने के कारण ऐसे लोगों को हमेशा धन की
कमी रहती है। किसी न
किसी रूप में धन की हानि होती
रहती है।
3. जिन लोगों को पितृ दोष होता है, उनकी शादी
होने में कई प्रकार की समस्याएं आती हैं।
4. घर-परिवार में किसी न किसी कारण झगड़ा
होता रहता है। परिवार के सदस्यों में मनमुटाव बना रहता है व
मानसिक अशांति के कारण जीना दूभर हो जाता है।
5. यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक किसी मुकद्में में उलझा
रहे या बिना किसी कारण उसे कोर्ट-कचहरी के
चक्कर काटना पड़े तो ये भी पितृ दोष का कारण हो सकता
है।
6. पितृ दोष होने पर परिवार का एक न एक सदस्य निरंतर रूप से
बीमार रहता है। यह बीमारी
भी जल्दी ठीक नहीं
होती।
7. पितृ दोष होने के कारण कन्या के विवाह में काफी
परेशानियों का सामना करना पड़ता है या तो कन्या का विवाह
जल्दी नहीं होता या फिर मनचाहा वर
नहीं मिल पाता।
उपरोक्त में से एक न एक बाधा पितृ दो
ष के कारण बनी
रहती है।
पितृ दोष निवारण के उपाय:-
1. अगर श्राद्ध करने वाले की साधारण आय हो तो वह
पितरों के श्राद्ध में केवल एक ब्राह्मण को भोजन कराए या भोजन
सामग्री जिसमें आटा, फल, गुड़, शक्कर, सब्जी
और दक्षिणा दान करें। इससे पितृ दोष का प्रभाव कम होता है।
2. अगर कोई व्यक्ति गरीब हो और चाहने पर
भी धन की कमी से पितरों का श्राद्ध
करने में समर्थ न हो पाए तो वह किसी पवित्र
नदी के जल में काले तिल डालकर तर्पण करे। इससे
भी पितृ दोष में कमी आती है।
3. विद्वान ब्राह्मण को एक मुट्ठी काले तिल दान करने
मात्र से भी पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।
4. अगर कोई व्यक्ति ऊपर बताए गए उपायों को करने में
भी किसी कारणवश कठिनाई महसूस करे तो वह
पितरों को याद कर गाय को चारा खिला दे। इससे भी पितृ
प्रसन्न हो जाते हैं।
5. इतना भी संभव न हो तो सूर्यदेव को हाथ जोड़कर
प्रार्थना करें कि मैं श्राद्ध के लिए जरूरी धन और साधन न
होने से पितरों का श्राद्ध करने में असमर्थ हूं। इसलिए आप मेरे पितरों
तक मेरा भावनाओं और प्रेम से भरा प्रणाम पहुंचाएं और उन्हें तृप्त
करें।...

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

रहस्यमयी और चमत्कारिक काल भैरव मंदिर – जहां भगवान काल भैरव करते है मदिरा पान.....

महाकाल की नगरी उज्जैन में स्तिथ काल भैरव
मंदिर के बारे में। इस मंदिर की सबसे बड़ी
विशेषता यह है की यहाँ पर भगवान काल भैरव साक्षात
रूप में मदिरा पान करते है। जैसा की हम जानते है काल
भैरव के प्रत्येक मंदिर में भगवान भैरव को मदिरा प्रसाद के रूप में
चढ़ाई जाती है। लेकिन उज्जैन स्तिथ काल भैरव मंदिर में
जैसे ही शराब से भरे प्याले काल भैरव की मूर्ति
के मुंह से लगाते है तो देखते ही देखते वो शराब के प्याले
खाली हो जाते है।

हज़ार साल पुराना है मंदिर –
मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर से करीब 8
कि.मी. दूर, क्षिप्रा नदी के तट पर कालभैरव
मंदिर स्थित है। कालभैरव का यह मंदिर लगभग छह हजार साल
पुराना माना जाता है। यह एक वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर है।
वाम मार्ग के मंदिरों में माँस, मदिरा, बलि, मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते
हैं। प्राचीन समय में यहाँ सिर्फ तांत्रिको को ही
आने की अनुमति थी। वे ही यहाँ
तांत्रिक क्रियाएँ करते थे। कालान्तर में ये मंदिर आम लोगों के लिए खोल
दिया गया। कुछ सालो पहले तक यहाँ पर जानवरों की बलि
भी चढ़ाई जाती थी। लेकिन अब यह
प्रथा बंद कर दी गई है। अब भगवान भैरव को केवल
मदिरा का भोग लगाया जाता है। काल भैरव को मदिरा पिलाने का सिलसिला
सदियों से चला आ रहा है। यह कब, कैसे और क्यों शुरू हुआ, यह
कोई नहीं जानता।
मंदिर में काल भैरव की मूर्ति के सामने झूलें में बटुक भैरव
की मूर्ति भी विराजमान है। बाहरी
दिवरों पर अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां
भी स्थापित है। सभागृह के उत्तर की ओर एक
पाताल भैरवी नाम की एक छोटी
सी गुफा भी है।

बुधवार, 24 अगस्त 2016

बाबा रामदेव जी को क्यों कहते हैं पीरों का पीर?

जैसलमेर। ।
बाबा रामदेवजी राजस्थान के प्रसिद्ध लोक देवता हैं।
रूणीचा (जैसलमेर) में बाबा का विशाल मंदिर है जहां दूर-दूर
से श्रद्धालु उन्हें नमन करने आते हैं। रामदेवजी सामुदायिक
सद्भाव तथा अमन के प्रतीक हैं।
बाबा का अवतरण वि.सं. 1409 को भाद्रपद शुक्ल दूज के
दिन तोमर वंशीय राजपूत तथा रूणीचा के शासक अजमलजी
के घर हुआ। उनकी माता का नाम मैणादे था। बाबा का
संबंध राजवंश से था लेकिन उन्होंने पूरा जीवन शोषित,
गरीब और पिछड़े लोगों के बीच बिताया। उन्होंने रूढ़ियों
तथा छूआछूत का विरोध किया।
भक्त उन्हें प्यार से रामापीर या राम सा पीर भी कहते हैं।
बाबा को श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। वे हिंदू-
मुस्लिम एकता के प्रतीक भी माने जाते हैं। भक्तों का उनके
प्रति समर्पण इतना है कि पाकिस्तान से मुस्लिम भक्त भी
उन्हें नमन करने भारत आते हैं
 
कुछ विद्वान मानते हैं कि बाबा का अवतरण वि.सं. 1409 में
उडूकासमीर - बाड़मेर में हुआ। उन्होंने रूणीचा में समाधि ली
थी, लेकिन बाबा के भक्तों के लिए इतिहास की इन
तिथियों से ज्यादा उनकी कृपा महत्वपूर्ण है। आज भी यहां
के शुभ कार्य बाबा के पूजन के बिना अधूरे हैं।
कहा जाता है कि जब रामदेवजी के चमत्कारों की चर्चा
चारों ओर होने लगी तो मक्का (सऊदी अरब) से पांच पीर
उनकी परीक्षा लेने आए। वे उनकी परख करना चाहते थे कि
रामदेव के बारे में जो कहा जा रहा है, वह सच है या झूठ?


बाबा ने उनका आदर-सत्कार किया। जब भोजन के समय उनके
लिए जाजम बिछाई गई तो एक पीर ने कहा, हम अपना
कटोरा मक्का में ही भूल आए हैं। उसके बिना हम आपका
भोजन ग्रहण नहीं कर सकते। इसके बाद सभी पीरों ने कहा
कि वे भी अपने ही कटोरों में भोजन करना पसंद करेंगे।
रामदेवजी ने कहा, आतिथ्य हमारी परंपरा है। हम आपको
निराश नहीं करेंगे। अपने कटोरों में भोजन ग्रहण करने की
आपकी इच्छा पूरी होगी।

यह कहकर बाबा ने वे सभी कटोरे रूणीचा में ही प्रकट कर
दिए जो पांचों पीर मक्का में इस्तेमाल करते थे। यह देखकर
पीरों ने भी बाबा की शक्ति को प्रणाम किया और
उन्होंने बाबा को पीरों के पीर की उपाधि दी।

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

इस तरह प्रकट हुआ था वृंदावन के बांके बिहारी जी का विग्रह...



वृंदावन में बांके बिहारी जी का एक भव्य मंदिर है।
इस मंदिर में बिहारी जी की काले रंग की एक
प्रतिमा है। इस प्रतिमा के विषय में मान्यता है कि
इस प्रतिमा में साक्षात् श्री कृष्ण और राधा समाए
हुए हैं। इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा कृष्ण के दर्शन
का फल मिल जाता है।


इस प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी
ही रोचक और अद्भुत है इसलिए हर साल मार्गशीर्ष
मास की पंचमी तिथि को बांके बिहारी मंदिर में
बांके बिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है। यह
तिथि इस वर्ष 7 दिसंबर को है।
बांके बिहारी के प्रकट होने की कथा
संगीत सम्राट तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास जी
भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्होंने अपने
संगीत को भगवान को समर्पित कर दिया था।

वृंदावन में स्थित श्री कृष्ण की रासस्थली निधिवन
में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे।
भगवान की भक्त में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने
बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और
गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ
जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को
दुलार करने लगते। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि
आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें
भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं। 
इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण की भक्ति में
डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी
प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ
गया और गाने लगे-
'भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम
घन दामिनी जैसे। प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न
टरि है तैसे।। अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई
सुंदरता ऐसे। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज
बिहारी सम वैसे वैसे।।'
श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास के पास रहने की
इच्छा प्रकट की। हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि
प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन
माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त
की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण
की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में
प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके
बिहारी नाम दिया।
बांके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं।
बांके बिहारी के विग्रह में राधा कृष्ण दोनों ही
समाए हुए हैं। जो भी श्री कृष्ण के इस विग्रह का
दर्शन करता है उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त के कष्टों दूर कर देते हैं।

Goldan Tample tamilnadu...

15,000 किलो शुद्ध सोने से बना है लक्ष्मी
का यह मंदिर 

स्वर्ण मंदिर, श्रीपुरम अथवा महालक्ष्मी स्वर्ण मन्दिर
तमिलनाडु राज्य के वेल्लोर नगर में स्थित है। यह मंदिर
वेल्लोर शहर के दक्षिणी भाग में निर्मित है। इस
महालक्ष्मी मंदिर के निर्माण में तक रीबन 15,000
किलोग्राम विशुद्ध सोने का इस्तेमाल हुआ है। स्वर्ण
मंदिर श्रीपुरम के निर्माण में 300 करोड़ रूपए से ज्यादा
राशि की लागत आई है। मंदिर के आंतरिक और बाह्य
सजावट में सोने का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल हुआ है। विश्व
में किसी भी मंदिर के निर्माण में इतना सोना नहीं लगा

है।
मंदिर का उद्घाटन अगस्त 2007 में हुआ था। रात में जब इस
मंदिर में प्रकाश किया जाता है, तब सोने की चमक देखने
लायक होती है। यहां पूरे सालभर श्रृद्धालुओं का तांता
लगा रहता है। क ई दिन तो यहां एक दिन में एक लाख से

ज्यादा श्रद्धालु आते हैं।
100 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले इस मंदिर में सर्वत्र
हरियाली नजर आती है। मंदिर की संरचना वृताकार है।
मंदिर परिसर में देश की सभी प्रमुख नदियों से पानी

लाकर सर्व तीर्थम सरोवर का निर्माण कराया गया है।



शनिवार, 20 अगस्त 2016

ॐ बनाना की सच्ची कहानी...



ओम बन्ना

ओम बन्ना एक पवित्र दर्शनीय स्थल है जो पाली जिले में स्थित है ये पाली शहर से मात्र बीस किमी दूर है यहाँ लोग सफल यात्रा और मनोकामना मांगने दूर दूर से आते है यहाँ ये एक बुलेट के रूप में पूजे जाते है ये मंदिर पूरी दुनिया का अनोखा और एक मात्र बुलेट मंदिर है [1]

परिचयसंपादित करें

ओम बन्ना का पूरा नाम ओम सिंह राठौड है ये चोटिला ठिकाने के ठाकुर जोग सिंह जी के पुत्र थे राजपूतो में युवाओ को बन्ना[2] कहा जाता है इसी वजह से ओम सिंह राठौड़ सभी में ओम बन्ना के रूप में प्रसिद्ध हुए [3]
इस से टकरा गए थे बन्ना
बुलेट बाईक
Om Bana sthan, near Chotila village, Pali, Rajasthan.jpg

क्या है मान्यतासंपादित करें

सन 1988 में ओम बन्ना अपनी बुलेट पर अपने ससुराल बगड़ी,साण्डेराव से अपने गाँव चोटिला आ रहे थे तभी उनका एक्सीडेंट एक पेड़ से टकराने से हो गया ओम सिंह राठौड़ की उसी वक़्त मृत्यु हो गयी एक्सीडेंट के बाद उनकी बुलेट को रोहिट थाने ले जाया गया पर अगले दिन पुलिस कर्मियों को वो बुलेट थाने में नही मिली वो बुलेट बिना सवारी चल कर उसी स्थान पर चली गयी अगले दिन फिर उनकी बुलेट को रोहिट थाने ले जाया गया पर फिर वही बात हुयी ऐसा तीन बार हुआ चौथी बार पुलिस ने बुलेट को थाने में चैन से बाँध कर रखा पर बुलेट सबके सामने चालू होकर पुनः अपने मालिक सवार के दुर्घटना स्थल पर पहुंच गयी अतः ग्रामीणो और पुलिस वालो ने चमत्कार मान कर उस बुलेट को वही पर रख दिया[4] उस दिन से आज तक वहा दूसरी कोई बड़ी दुर्घटना वह नही हुयी जबकि पहले ये एरिया राजस्थान के बड़े दुर्घटना क्षेत्रो में से एक था [5] ओम बन्ना की पवित्र आत्मा आज भी वह लोगो को अपनी मौजूदगी का एहसास कराती है आज भी रोहट थाने के नए ठाणेदार जोइनिंग से पहले वह धोक देते है[6] [7]

पूजा स्थलसंपादित करें

पाली जोधपुर राष्ट्रीय राज मार्ग पर ये स्थान है यहा आज भी वही बुलेट मौजूद है और ओम बन्ना का चबूतरा भी है जहा उनका एक्सीडेंट हुआ था यहाँ दिन रात जोत जलती रहती है और ग्रामीण यहाँ नारियल ,फूल,दारू आधी चढ़ावा चढ़ते है दूर दूर से श्रद्धालु यहाँ आते है[8]